Ram Prasad Bismil poems in Hindi – Best Hindi Poems 2020

हेल्लो, हम आपके लिए लाये है बेस्ट कलेक्शन ऑफ राम प्रसाद बिस्मिल (Ram Prasad Bismil poems ) जी का बेहतरीन कविता संग्रह, जिसे आप पढ़ सकते है एंड शेयर कर सकते है अपने फ्रेंड्स के साथ|

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

Ram Prasad Bismil Poems

Ram Prasad Bismil Poesms in Hindi
Ram Prasad Bismil Poesms in Hindi

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ु-ए-कातिल में है

करता नहीं क्यूँ दूसरा कुछ बातचीत,
देखता हूँ मैं जिसे वो चुप तेरी महफ़िल में है

ए शहीद-ए-मुल्क-ओ-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार,
अब तेरी हिम्मत का चरचा गैर की महफ़िल में है

वक्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आसमान,
हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है

खैंच कर लायी है सब को कत्ल होने की उम्मीद,
आशिकों का आज जमघट कूच-ए-कातिल में है

यूँ खड़ा मक़तल में क़ातिल कह रहा है बार-बार,
क्या तमन्ना-ए-शहादत भी किसी के दिल में है

वो जिस्म भी क्या जिस्म है जिसमें ना हो खून-ए-जुनून
तूफ़ानों से क्या लड़े जो कश्ती-ए-साहिल में है,

हाथ जिन में हो जुनूँ कटते नही तलवार से,
सर जो उठ जाते हैं वो झुकते नहीं ललकार से
और भड़केगा जो शोला-सा हमारे दिल में है,

है लिये हथियार दुशमन ताक में बैठा उधर,
और हम तैय्यार हैं सीना लिये अपना इधर
खून से खेलेंगे होली गर वतन मुश्किल में है, –

हम तो घर से निकले ही थे बाँधकर सर पे कफ़न,
जान हथेली पर लिये लो बढ चले हैं ये कदम
जिन्दगी तो अपनी मेहमान मौत की महफ़िल में है,

दिल में तूफ़ानों की टोली और नसों में इन्कलाब,
होश दुश्मन के उड़ा देंगे हमें रोको ना आज
दूर रह पाये जो हमसे दम कहाँ मंज़िल में है,

(नोट=इस रचना के कवि बिस्मिल अज़ीमाबादी हैं, – राम प्रसाद बिस्मिल की कविताएँ
परन्तु मशहूर यह राम प्रसाद बिस्मिल के नाम से ही है।)
राम प्रसाद बिस्मिल की कविताएँ

2. जिन्दगी का राज

चर्चा अपने क़त्ल का अब दुश्मनों के दिल में है,
देखना है ये तमाशा कौन सी मंजिल में है ?

कौम पर कुर्बान होना सीख लो ऐ हिन्दियो !
ज़िन्दगी का राज़े-मुज्मिर खंजरे-क़ातिल में है !

साहिले-मक़सूद पर ले चल खुदारा नाखुदा !
आज हिन्दुस्तान की कश्ती बड़ी मुश्किल में है !

दूर हो अब हिन्द से तारीकि-ए-बुग्जो-हसद,
अब यही हसरत यही अरमाँ हमारे दिल में है !

बामे-रफअत पर चढ़ा दो देश पर होकर फना,
‘बिस्मिल’ अब इतनी हविश बाकी हमारे दिल में है

Ram prasad bismil poems

3. मुखम्मस-हैफ़ हम जिसपे कि तैयार थे मर जाने को

Poems of ram prasad bismil

हैफ़ हम जिसपे कि तैयार थे मिट जाने को,
यक-ब-यक हमसे छुड़ाया उसी कासाने को,
आस्माँ क्या यही बाकी था सितम ढाने को,


लाके गुर्बत में जो रक्खा हमें तड़पाने को,
क्या कोई और बहाना न था तरसाने को!

फिर न गुलशन में हमें लाएगा सैयाद कभी
याद आएगा किसे यह दिल–ए–नाशाद कभी
क्यों सुनेगा तू हमारी कोई फ़रियाद कभी


हम भी इस बाग़ में थे क़ैद से आज़ाद कभी
अब तो काहे को मिलेगी ये हवा खाने को

दिल फ़िदा करते हैं क़ुरबान जिगर करते हैं
पास जो कुछ है वो माता की नज़र करते हैं
खाना वीरान कहां देखिए घर करते हैं


ख़ुश रहो अहल–ए–वतन, हम तो सफ़र करते हैं
जाके आबाद करेंगे किसी वीराने को

न मयस्सर हुआ राहत से कभी मेल हमें
जान पर खेल के भाया न कोई खेल हमें
एक दिन का भी न मंज़ूर हुआ बेल हमें


याद आएगा अलीपुर का बहुत जेल हमें
लोग तो भूल गये होंगे उस अफ़साने को

अंडमान ख़ाक तेरी क्यों न हो दिल में नाज़ां
छूके चरणों को जो पिंगले के हुई है जीशां
मरतबा इतना बढ़े तेरी भी तक़दीर कहां


आते आते जो रहे ‘बॉल तिलक‘ भी मेहमां
‘मांडले‘ को ही यह एज़ाज़ मिला पाने को

बात तो जब है कि इस बात की ज़िदे ठानें
देश के वास्ते क़ुरबान करें हम जानें
लाख समझाए कोई, उसकी न हरगिज़ मानें


बहते हुए ख़ून में अपना न गरेबां सानें
नासेह, आग लगे इस तेरे समझाने को

अपनी क़िस्मत में अज़ल से ही सितम रक्खा था
रंज रक्खा था, मेहन रक्खा था, ग़म रक्खा था
किसको परवाह थी और किसमे ये दम रक्खा था


हमने जब वादी–ए–ग़ुरबत में क़दम रक्खा था
दूर तक याद–ए–वतन आई थी समझाने को

हम भी आराम उठा सकते थे घर पर रह कर,
हमको भी पाला था माँ-बाप ने दुःख सह-सह कर,
वक्ते-रुख्सत उन्हें इतना भी न आये कह कर,


गोद में अश्क जो टपकें कभी रुख से बह कर,
तिफ्ल उनको ही समझ लेना जी बहलाने को!

एक परवाने का बहता है लहू नस-नस में,
अब तो खा बैठे हैं चित्तौड़ के गढ़ की कसमें,
सरफ़रोशी की अदा होती हैं यूँ ही रस्में,


भाई खंजर से गले मिलते हैं सब आपस में,
बहने तैयार चिताओं से लिपट जाने को!

अब तो हम डाल चुके अपने गले में झोली
एक होती है फक़ीरों की हमेशा बोली
ख़ून में फाग रचाएगी हमारी टोली


जब से बंगाल में खेले हैं कन्हैया होली
कोई उस दिन से नहीं पूछता बरसाने को

अपना कुछ गम नहीं लेकिन ये ख़याल आता है,
मादरे-हिन्द पे कब तक ये जवाल आता है,
कौमी-आज़ादी का कब हिन्द पे साल आता है,


कौम अपनी पे तो रह-रह के मलाल आता है,
मुन्तजिर रहते हैं हम खाक में मिल जाने को!

नौजवानों ! जो तबीयत में तुम्हारी खटके,
याद कर लेना कभी हमको भी भूले भटके,
आपके अज्वे-वदन होवें जुदा कट-कट के,


और सद-चाक हो माता का कलेजा फटके,
पर न माथे पे शिकन आये कसम खाने को!

देखें कब तक ये असिरान–ए–मुसीबत छूटें
मादर–ए–हिंद के कब भाग खुलें या फूटें
‘गाँधी अफ़्रीका की बाज़ारों में सडकें कूटें


और हम चैन से दिन रात बहारें लूटें
क्यों न तरजीह दें इस जीने पे मर जाने को

कोई माता की उम्मीदों पे न डाले पानी
ज़िंदगी भर को हमें भेज के काले पानी
मुंह में जल्लाद हुए जाते हैं छाले पानी


आब–ए–खंजर का पिला करके दुआ ले पानी
भरने क्यों जायें कहीं उम्र के पैमाने को

मैक़दा किसका है ये जाम-ए-सुबू किसका है
वार किसका है जवानों ये गुलू किसका है
जो बहे कौम की खातिर वो लहू किसका है
आसमां साफ बता दे तू अदू किसका है
क्यों नये रंग बदलता है तू तड़पाने को
Poems of ram prasad bismil
दर्दमन्दों से मुसीबत की हलावत पूछो
मरने वालों से ज़रा लुत्फ़–ए–शहादत पूछो

चश्म–ए–गुस्ताख से कुछ दीद की हसरत पूछो
कुश्त–ए–नाज़ से ठोकर की क़यामत पूछो
सोज़ कहते हैं किसे पूछ लो परवाने को
Poems of ram prasad bismil


सर फ़िदा करते हैं कुरबान जिगर करते हैं,
पास जो कुछ है वो माता की नजर करते हैं,
खाना वीरान कहाँ देखिये घर करते हैं!
खुश रहो अहले-वतन! हम तो सफ़र करते हैं,
जा के आबाद करेंगे किसी वीराने को !

नौजवानों यही मौक़ा है उठो खुल खेलो
और सर पर जो बला आए ख़ुशी से झेलो
क़ौम के नाम पे सदक़े पे जवानी दे दो
फिर मिलेंगी न ये माता की दुआएं ले लो
देखें कौन आता है इरशाद बजा लाने को
(मुखम्मस=उर्दू कविता का एक प्रारूप है। इसमें
प्रत्येक बन्द 5-5 पंक्ति का होता है पहले बन्द
की सभी पंक्तियों में एक-सी लयबद्धता होती है,
जबकि बाद के सभी बन्द अपनी अन्तिम पंक्ति
में शुरुआती बन्द की आखिरी बन्दिश लय में
आबद्ध होते रहते हैं, हैफ़=अफ़सोस, फ़िदा=कुर्बान,
काशाने=घर, बेल=ज़मानत, नासेह=प्रचारक, रुख=
चेहरा, तिफल=बच्चा, सद=सौ, शिकन=माथे के बल,
असीरान-ए-मुसीबत=कैद का दुख, गुलू=गला,
अदू=दुश्मन, चश्म=आँख, इरशाद बजा लाना =
कहा मानना) -Poems of ram prasad bismil

4. हे मातृभूमि

हे मातृभूमि ! तेरे चरणों में सिर नवाऊँ ।
मैं भक्ति भेंट अपनी, तेरी शरण में लाऊँ ।

माथे पे तू हो चन्दन, छाती पे तू हो माला;
जिह्वा पे गीत तू हो, तेरा ही नाम गाऊँ ।

जिससे सपूत उपजें, श्रीराम-कृष्ण जैसे ;
उस धूल को मैं तेरी निज शीश पे चढ़ाऊँ ।

माई समुद्र जिसकी पदरज को नित्य धोकर;
करता प्रणाम तुझको, मैं वे चरण दबाऊँ ।

सेवा में तेरी माता ! मैं भेदभाव तजकर;
वह पुण्य नाम तेरा, प्रतिदिन सुनूँ सुनाऊँ ।

तेरे ही काम आऊँ, तेरा ही मन्त्र गाऊँ ।
मन और देह तुझ पर बलिदान मैं चढ़ाऊँ ।

Poems of ram prasad bismil

5. फूल

फूल ! तू व्यर्थ रह्यो क्यों फूल ?
फूल ! तू व्यर्थ रह्यो क्यों फूल ?

हो मदान्ध निज निर्माता को गयो हृदय से भूल
रूप-रंग लखि करें चाह सब, को‍उ लखे नहिं शूल
अन्त-समय पद-दलित होयगी निश्चय तेरी धूल
चलत समीर सुहावन जब लौं समय रहे अनुकूल ।

फूल ! तू व्यर्थ रह्यो क्यों फूल ?
फूल ! तू व्यर्थ रह्यो क्यों फूल ?

यौवन मद-मत्सर में काट्यो, पर-हित कियो न भूल
अम्ब कहाँ से मिल सकता है यदि बो दिए बबूल
नश्वर देह मिले माटी में होकर नष्ट समूल
प्यारे ! घटत आयुक्षण पल-पल जय हरि मंगल मूल

फूल ! तू व्यर्थ रह्यो क्यों फूल ?
फूल ! तू व्यर्थ रह्यो क्यों फूल ?

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